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Monday, September 18, 2017

ढलती उम्र का कवि

बस एक अदद कविता! 
लिखने के फिराक में हूँ
लेकिन बात नहीं बन पा रही है

क्योंकि, एक अदद जो उम्र थी न,
वही अब, ढलान की ओर है,
फिर कहो, कैसे अब अन्तस् में,
कोई बात, क्योंकर हलचल मचाएगी!

हाँ अब तो, सामने से गुजरती हर बात
बस, एक अजीब सी उदासी के साथ
यूँ ही गुजर जाती है,

लेकिन फिर भी,
मन अब तजुर्बेकार बन चुका है,
जैसे,
राजनीति और नेता, तजुर्बे से सीख
ढलती उम्र में, अकसर
महानता की ओर पहुँच जाते हैं

हाँ ढलती उम्र में, मन के सारे भाव
तजुर्बे के साथ सपाट चेहरे वाले
नेता से बन जाते हैं।
शायद इसीलिए, ढलती उम्र में
कविता नहीं गढ़ी जाती।
                                      --विनय

Thursday, June 22, 2017

जब मैं देखता हूँ, समाजों में

जब मैं देखता हूँ, समाजों में
यहाँ, सिधाई को, अकसर
दलित की तरह ट्रीट किया जाता है,
असल में सिधाई और कुछ नहीं
एक नियम भर है, और नियम ही
धीरे-धीरे अछूत होता जाता है।

जब भी देखता हूँ, समाजों में,
बस, मैं ये नहीं कहता कि
सिधाई नियम ही है, हो सकता है
इसमें भी कुछ भ्रम हो, कुछ
गलतियां हों, लेकिन इन्हें ही
चाहे अनचाहे, बे-नियम बताकर,
अयोग्य घोषित कर, अकसर
बस्तियों के किनारे, सिधाई को
तनहा छोड़ दिया जाता है।

हाँ, जब मैं देखता हूँ, समाजों में
सिधाई को बे-नियम बताकर
श्रेष्ठता के ये दम्भी, उन्हें,
सलीके के मोहताज, हीन और
बे-कद्री का बिम्ब बना देते हैं।

जब मैं देखता हूँ, समाजों में,
खाँचे बनते हुए देखता हूँ,
इन खाँचों में, बेरहमी से,
सिधाई को, ठूस-ठूस कर, भर
सदियों से, तड़फड़ाते, विवश,
छोड़ दिया जाता है, यही तो,
दलित होते जाने की प्रक्रिया है।

जब मैं देखता हूँ, समाजों में
बड़े करीने से, वे, स्वयं को,
सजा लिया करते हैं, और ये, उन्हें,
सीधेपन को, बेवकूफियों का पुलिंदा,
बता दिया जाता हैं।

जब मैं देखता हूँ, समाजों में
सिधाई और कुछ नहीं,
केवल मजदूर भर हुआ करती है,
यह कोई माफियागीरी नहीं, अवश,
बस ईंट और गारे की तरह 
मीनार में इस्तेमाल हुआ करती है।
और ये करीने से सजे लोग, इसे,
मीनार की कमजोरी का भी,
जिम्मेदार बता दिया करते हैं..!

जब मैं देखता हूँ, समाजों में,
ऐसे ही, अछूत बना करते हैं।
            ******

बड़ी अलोकतांत्रिक हैं रोटियाँ!

यहाँ जिसे देखा, फकत
दो जून की रोटी में
भिड़े पड़े देखा!
हाँ, जब भी उसे देखा,
रोटी ही बेलते देखा !!

लेकिन, बड़ी अलोकतांत्रिक हैं
ये रोटियाँ, हाँ,
लोकतंत्र की आड़ में
दो जून से भटककर
बदनसीब होती हैं रोटियाँ।

बदनसीबी में, मुस्कुराती हैं रोटियाँ
टूटते चाँद का तिलस्म देख,
कवि को धिक्कारती हैं रोटियाँ
सारा भ्रम ढह गया है, क्योंकि
चाँद सी नहीं होती हैं अब रोटियाँ!

भूख ही नहीं, भूखे को भी
जानती हैं, ये मचलती सी रोटियाँ
दो जून भर की नहीं, अब
गोल-गोल घूमती हैं रोटियाँ!
रूप बदलती, अब
तिजोरी के तिलिस्म को भी
पहचानती हैं रोटियाँ।

दो जून का ग्लोबलाइजेशन
जानती हैं ये रोटियाँ,
तभी तो, वह भी रात दिन
बेलता है रोटियाँ,
तिजोरियों में भर-भर
बेतहाशा रख रहा है रोटियाँ।

अंतरिक्ष में जाकर, दो जून के
कांसेप्ट को बदलते देखा।
तभी तो, जब भी देखा
उसे, रोटी ही बेलते देखा,
दो जून की उसकी भूख
तिजोरियों में ढलते देखा।

यदि, मुझे मिल जाए कोई
ढूँढ़ता अपनी दो जून की रोटियाँ
तो बता दूँ उसे, उसके
दो जून की रोटियों का पता
चाँद में नहीं, अब तिजोरियों में
छिप रही हैं ये रोटियाँ..!
बड़ी अलोकतांत्रिक बेरहम सी
ये फकत दो जून की रोटियाँ..!!

Monday, September 26, 2016

मौन हूँ, होठ भिंचे हुए हैं

मौन हूँ, होठ भिंचे हुए हैं!

सीमा के प्रहरी एक छद्म युद्ध में

फिर से शहीद हुए हैं। 

हमारे लोकतंत्र में ये सैनिक 

राजनीति नहीं करते, और

शायद इसीलिए ये प्रहरी 

राजनीति के शिकार हुआ करते हैं।

क्योंकि, किसी देश के लोकतंत्र में 

बुनियादी हो चुके उसूलों में, अब 

राजनीति न करने वाले ही

राजनीति के शिकार हुआ करते हैं।

शायद, ये देश

राजनीति से ही बनते हैं, और 

राजनीति की सीमाएं हुआ करती हैं, 

तभी तो ये देश भी, अपनी अपनी 

सीमाओं में कैद अपनी अपनी

राजनीति किया करते हैं। 

फिर, सीमाओं के प्रहरी 

राजनीति की टकराहटों में 

अकसर शहीद हुआ करते हैं। 

जैसे, कई वर्ष पहले का वह चित्र 

आँखों के सामने अकसर घूम जाता है। 

हाँ, उस दिन एक जनांदोलन जब 

एक नेता के कब्जे में आ गया था। 

छत की बालकनी से वही नेता 

चाय की चुस्कियों के बीच, अपना 

मुस्कुराता हुआ चेहरा लिए 

दिखाई पड़ गए थे, और 

हम किसी सीमा के प्रहरी बन 

उन्हें ढूँढ़ते, नीचे से

उनकी राजनीति बचाए खड़े थे। 

हाँ, ऐसे ही जन को अकेला छोड़

यह मुआ तंत्र, मुस्कुराया करता है।

हाँ,  इन शहादतों पर ये बेबस से 

आँसू निकल आए हैं, लेकिन 

न जाने क्यों, युद्ध की ललकार सुन 

फिर फिर, यह मन सिहर जाता है। 

हाँ, जानता हूँ 

इस या उस राजनीति के सैनिक 

आपस में दुश्मन नहीं हुआ करते हैं। 

लेकिन अकसर आपस में, 

वही लड़ा करते हैं। 

युद्ध की हुंकारों को सुन 

हम काँप जाते हैं। 

राजनीति की टकराहटों से 

हम भयाक्रांत हो जाते हैं। 

सैनिकों की शहीदी में, 

अकसर कुछ बेबस से चेहरे 

सामने आ जाते हैं। 

एकाएक हम 

यह सोच, फिर मौन हो जाते हैं 

यदि यह राजनीति न होती तो 

ये देश न होते, फिर 

ये युद्ध न हुआ करते, लेकिन,

युद्ध से क्या यह, 

राजनीति खतम हुआ करती है? 

मुझे तो लगता है 

ये हुंकार भी, सच नहीं हुआ करते हैं,

उस नेता की तरह, जो 

बालकनी से तमाशा देखा करते हैं। 

बेशक, युद्ध कर लो 

पर इससे क्या राजनीति के खाँचे 

मिटा करते हैं?

वह जिन्दा रहती है, हमारे

राजनीतिक लोकतंत्र में, जहाँ हम 

अपनी तमाम विद्रूपताओं के साथ 

फिर फिर इसकी सड़ांधों में ही

बेखौफ, राजनीति किया करते हैं। 

जैसे कि, टी वी के वे ऐंकर आपस में

एक-दूसरे को देख मुस्कुराते हुए 

सत्रह सैनिकों की शहीदी की 

खबर सुनाते हैं। 
      
                      --Vinay (विनय)

Saturday, September 17, 2016

कविता का विघटन

सोचता हूँ, और जैसा कि, मैं 
अकसर कभी-कभी सोच लेता हूँ.. 
बहुत दिन हुए कोई कविता लिखे 
क्यों न आज कोई कविता लिख दूँ।

मेरा लरजता कवित्व-भाव बेसब्री में,
उस अँधेरे, कबाड़खाने का
दरवाजा खटखटाता है, जिसमें
बेतरतीब सी निष्प्रयोज्य चीजें
आपस में बतियाते हुए, अपनी उपेक्षा में
आड़े, तिरछे, औंधे, उतान, रूठे हुए 
बिम्ब की प्रतीक्षा में कंडम से पड़े हैं । 

भड़भड़ती आवाजों से सजग, वे 
अपनी उस बेतरतीबी में ही, जैसे 
मेरे कवित्व-भाव को दुत्कारने लगे हैं। 
मनुहार पर, किसी रूठे नेता की तरह 
चढ़ती उतरती कीमतों को देखकर 
कह, अब, मँहगाई "दाल" नहीं, फिर 
अपने नए बिम्ब का पता पूँछते हैं। 

कबाड़खाने के दरवाजे पर ही खड़ा 
मेरा कवित्व-भाव, पैंतरेबाजी देखता है 
राजनीतिक दल में किसी नेता को 
बिना हील-हुज्जत सिंहासन जरूरी है 
तो कविता में भी, भावों की प्रतिष्ठा में 
नए नए बिम्ब तलाशना जरूरी है। 

मेरा कवित्व-भाव बेचैन बिम्बाभाव में 
तमाम भावों की उठापटक में, और 
भावों की बिम्बलोलुपता देख, उन्हें 
निष्प्रयोज्य मान, अपनी कविता को 
विवश, विघटित होते देखता रहता हैं।
                                                --विनय

Thursday, August 18, 2016

बे-तुक की कविता!

मैंने तो देखा है, और 
शायद आप ने भी देखा हो 
अकसर हम अपने घर के सामने के 
घने हरियाले पत्तियों वाले पेड़ों को, 
घर की खूबसूरती दिखाने के लिए 
बेदर्दी से कटवा दिया करते हैं।

लेकिन लोग-बाग, इन पेड़ों के प्रति 
थोड़ी सी सहृदयता भी दिखा देते हैं 
जैसे कि इन पेड़ों को बौना बनाकर 
अपने गमलों में सजा लिया करते हैं।

और, गमले की थोड़ी सी मिट्टी में 
बेदर्दी की काँट-छाँट सह कर 
ये पेड़, अपने विवश-बौनेपन से 
हमारी हवेली की भव्यता में 
आखिर, चार-चाँद लगा देते है।

जमीन से ऊपर उठ चुके हम लोग 
अपनी भव्यता के कायल हैं, 
तभी तो, पनपने वाले पौधों में 
अपनी भव्यता की आड़ समझ 
बौनेपन का रोग लगा देते हैं।

हाँ, अब हम मिट्टी-पानी के भय से 
अपने चारों ओर की जमीन को 
बेतरह बेहिसाब और पुख्ता, और 
पक्का कर लिया करते हैं 
जैसे कि हम, अकवि होने के डर से 
कविता कविता लिख वाहेच्छा में 
एक पक्का कवि बन लिया करते हैं।

फिर देखिए, भव्यता के हम अनुयायी 
जमीन और मिट्टी से ही उठे हुए लोग 
मिट्टी से जुड़े हर उस पौध को 
अपनी बनाई पक्की जमीन पर, बेजान 
खरपतवार समझ लिया करते है।
फिर, इनके उगने या फैलने के 
विकल्पों को सीमित कर इन पर 
पाबंदी लगा दिया करते हैं। 
यदि बहुत ज्यादा हुआ तो इन्हें 
लान के बाड़े में थोड़ी सी मिट्टी दे 
शोभाकारक समझ भव्यता की तरह 
अपने लिए ही उगा लिया करते हैं।

हाँ, न जाने क्यों, अकसर 
हम अपनी भव्यताओं को भी 
जमीन से ऊपर उठा समझ लेते हैं 
तभी तो, वह तिरंगा भी किसी 
ऊँचे बुर्ज पर लहराया जाता है।

शायद, यह भी इन्हीं ऊँचाइयों से 
हमारी निचाइयों को परखता है 
जैसे कि कवि होने के गुमान में 
मैं अकवि, मेहनत कर 
बे-तुक की कविता करने की 
टुच्चई किया करता हूँ।
                               -विनय

Saturday, July 23, 2016

मैं डरपोक हूँ, शायद इसीलिए कवि हूँ।

मैं डरपोक हूँ, शायद
इसीलिए कवि हूँ।
बादल की गड़गड़ाहटों से
डरे सहमें एक बच्चे की तरह
मैं भी भावनाओं की 
इस अँधेरी कोठरी में दुबक
अंतस् में ही बरस, स्वयं को
बहा ले जाता हूँ।
अँधेरी कोठरी की
खिड़कियों से झिरता
बाहर का उजास देख,
रीते धार को छोड़, यहाँ से
निकल भागता हूँ।
बाहर रोशनी से नहाई
चमकती हरी पत्तियों को देख
इनके झुरमुटों के बीच पसरे
अँधेरों में, डर तलाश कर,
फिर से अंतस् में छिप,
कविता रचा करता हूँ।
आखिर में, अंतस् में ही बरस
धीरे-धीरे सूखकर
निडरता की रेतीली धार ले
दुनियाँ में खो जाता हूँ।
अब न मैं हूँ, न उजाले में
धूप में चमकती हरी पत्तियाँ हैं
और न इसमें छिपा कोई अँधेरा है,
अपने अंतस् के इस रीतेपन के साथ
एक अदद डर तलाशता , दर दर
कविता के लिए भटकता हूँ।
और एक अदद डर
मेरी कविता की अर्थवत्ता है।
यह गजब का मनोरंजन है, क्योंकि
मैं डरपोक हूँ, शायद
इसीलिए कवि हूँ।
---------विनय